जमीन को महिलाओं से बेहतर कोई नहीं जानता, फिर भी मालिकाना हक पुरुषों का क्यों!

आजाद बोल के लिए निगहत और फरहा की सोशल एक्टिविस्ट रिनचिन से लंबी बातचीत

 रिनचिन ने कहा

g कोयला खदानों के आसपास पर्यावरण नियमों का हो रहा खुला उल्लंघन
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आदिवासी जीवन पर पड़ रहा असर, प्रदूषण से पानी, मिट्टी, हवा प्रभावित
g अलग राह पर चलने वाली महिलाओं पर पहला दबाव घर—परिवार से ही शुरू होता है
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समता मूलक समाज बनाने के लिए सभी को मिल जुलकर लड़नी होगी लड़ाई
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ब्राम्हणवादी, कारपोरेट परस्त, हिंदूवादी, पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुटा है जरूरी

(छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में महिला मुद्दों से लेकर आदिवासी व दलित संगठनों के साथ मिलकर काम करने वाली रिनचिन का ज्यादातर वक्त जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्षरत साथियों के बीच गुजरता है। इसके अलावा वे बच्चों की कहानियां लिखती हैं, फिल्मों की स्क्रिप्ट से लेकर फिल्म निर्माण से भी जुड़ी हैं। पिछले दिनों आजाद बोल मीडिया कोर्स के साथी निगहत और फरहा ने उनसे निजी जिंदगी से लेकर महिला, आदिवासी, कोयला खनन, पर्यावरण, राजकीय दमन समेत तमाम मुद्दों पर लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश। इसे वीडियो फारमेट में आप यूट्यूब पर देख सुन सकते हैं।)

आपका बचपन कैसा गुजरा? शुरुआती पढ़ाई और आसपास का माहौल कैसा था?
रिनचिन: मेरा बचपन भारत के कई क्षेत्रों में घूमते हुए बीता। मेरा घर दूरदराज़ इलाकों में हुआ करता था। पिता जी एक ऐसी नौकरी करते थे, जिसमें हर दो—तीन साल में भारत के अलगअलग क्षेत्रों में तबादला होता रहता था। इस वजह से मैंने देश के अलगअलग राज्य, शहरों में अपनी पढ़ाई की। मेरा हर दो—तीन साल में स्कूल बदलता रहता था। इसी तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन हुआ। फिर मुंबई से मैंने मास्टर्स की पढ़ाई की। साथ में सोशल वर्क का कोर्स किया।

आपने देश दुनिया में हस्तक्षेप के लिए सामाजिक क्षेत्र में काम करना ही क्यों चुना?
रिनचिन: मेरा कई चीज़ों में रुझान था। लेकिन मैं जिस परिवार से थी, या जैसा जीवन जी रही थी, उसमें मेरा बहुत ज़्यादा सरोकार नहीं था। टीवी देखना, किताबें पढ़ना यही सब था। ग्रेजुएशन के दौरान कई महिला संगठनों से मेरी मुलाक़ात हुई। उस दौर में जो सोशल मूवमेंट चल रहे थे, उन लोगों से मेरा ज़्यादा जुड़ाव होने लगा था। उसके बाद से मेरे अंदर सवाल उठने लगे। जीवन को लेकर समाज में महिलाओं के साथ होने वाली गैरबराबरी, समाज की जाति व्यवस्था हो या लोगों की जमीन सरकार द्वारा छीनी जा रही हो ऐसे अने मुद्दों को लेकर मेरी समझ बनना शुरू हुई। असल में, आप जिन चीज़ों को पढ़ते हो, समझते हो, काम करते हो, उन मुद्दों को समझते हो, उनसे उलझते हो। कई बार आपके उद्देश्य, आपके काम को तय करते हैं। इसी से तय होता है कि आप किस क्षेत्र में काम करेंगे। मुझे नहीं लगता मैंने सामाजिक क्षेत्र मैं काम करना चुना है, बल्कि सामाजिक क्षेत्र ने काम करने के लिए मुझे चुना है।

जनता से जुड़े हुए किन किन मसलों पर या किन क्षेत्रों में आप काम करती हैं?
रिनचिन: मैंने अपने काम की शुरुआत मध्यप्रदेश भोपाल से की थी। बीते 10 साल से यानी 2011 से मेरा ज़्यादातर वक़्त छत्तीसगढ़ में गुज़रता है। जहाँ पी. यू. सी. एल. नामक मानव अधिकार संगठन का मैं हिस्सा हूं। कोयला खदान के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा है। इसमें रायगढ़ जिले के विलायतपुर में कोयला खदान के इलाके में मैं वहाँ रह कर काम करती हूं। भोपाल में शहरी मज़दूर संगठन के साथ जुड़कर काम कर रही हूं।

इन संगठनों को शुरू करने का उद्देश्य क्या था, इनसे आपका जुड़ाव कैसे हुआ?
रिनचिन: जिन संगठनों से मैं जुड़ी हूं, उनमें से कुछ तो पहले से हैं। जैसे, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की शुरुआत शंकर गुहा नियोगी जी ने की थी। उससे कई लोगों का जुड़ाव हुआ। दूसरा मैं एकतारा कलेक्टिव संगठन का हिस्सा हूं। यह सांस्कृतिक समूह है। इसकी शुरुआत गीता, महीन, सुशील, फरीदा, पल्लव, प्रियंका और अन्य साथियों ने मिलकर भोपाल में की थी। मैं भी इसी का हिस्सा थी। एकतारा कलेक्टिव में यह सभी साथी फ़िल्म बनाने या सांस्कृतिक काम करने के लिए जुड़े थे। जो चीजें हमारे करीब हैं, जिन मुद्दों को हम सांस्कृतिक तरीके से साहित्य जरिये से एक्सप्रेस करना चाहते थे, उसमें एक दूसरे की मदद के लिए इसकी शुरुआत हुई।

एकतारा कलेक्टिव के जरिये फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?
रिनचिन: समाज में ज़्यादातर लोगों का रुझान हिंदी फिल्मो में है और इसे पसंद भी करते हैं।अधिकतर फ़िल्म जो पर्दे पर रिलीज़ होती हैं, वो मैनस्ट्रीम फिल्में होती हैं। उसमें काम करने का मौका किसी एक तबक़े को ही मिलता है। फिल्म की इस विधा पर पूंजीवाद हावी है। उसी तरह के लोग फ़िल्मों का हिस्सा बनते हैं। आम नागरिकों की समस्याओं, बस्ती की रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी दिक्कतों को उसी पूंजीवादी समाज के लोग दर्शाते हैं। तो जो सामाजिक असलियत है, उसको दर्शाने वाले व्यक्ति भी मैनस्ट्रीम के ही होते हैं। एकतारा कलेक्टिव का उद्देश्य ये था कि हम बस्ती के लोग जो गरीब तबके से हैं, वो अपनी समस्या अपने साथ होने वाली गैरबराबरी को खुद दिखाएं। इसमें कहानी वही हो जो बस्ती और समाज का मुद्दा हो। इसके लिए एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म हो और समाज के अंदर एक बदलाब की लौ जला सके। इसको करने के लिए एक संगठन ज़रूरी था, जिसमें सबको बराबरी और सहभागिता का अधिकार हो। इसके लिए हमने अलगअलग तबके के साथियों से बात की। इसमें महिला, युवा, बच्चे, पुरुष शामिल हुए और उसे बनाया।

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एकतारा के तहत पहली फिल्म का अनुभव कैसा रहा, क्या क्या काम किया अभी तक?
रिनचिन: एकतारा की सबसे पहली फ़िल्म थी चंदा के जूते। इसमें बस्ती की एक लड़की के स्कूल के अनुभव को दर्शाया है। अभी तक एकतारा कलेक्टिव ने 4 फिल्में बनाई हैं, जिसमें चंदा के जूते, जादूई मछली, तुरुप और एक नई फिल्म होटल राहगीर है, जो अभी बन गई है। एकतारा कलेक्टिव ने कई अंग्रेज़ी फिल्मों की डबिंग भी की है। एकतारा कलेक्टिव में सभी काम मिल जुलकर करते हैं। कोई एडिटिंग करता है, कोई एक्टिंग। कोई स्क्रिप्ट लिखते हैं। तरह तरह के कौशल और अनुभव के अन्य साथी एकतारा में जुड़े हैं।

एकतारा कलेक्टिव का रिसोर्स क्या है, इसके लिए फंड रेज़ कैसे करते हैं?
रिनचिन: एकतारा कलेक्टिव के रिसोर्स की शुरुआत चंदे से हुई थी। पहली फ़िल्म चंदा के जूते 20 मिनट की थी, तो सबने चंदा करके इसे बनाया था। हमारी जो भी फिल्में बन रही हैं, वो क्राउड फंड से बन पा रही हैं। हमारे हर काम में पैसा ऐसे ही इकट्ठा होता है। या फिर फ़िल्म को कोई देखता है, उसके व्यू फीस आती है तो उसे अगले प्रोडक्शन में डालते हैं। फिलहाल अभी तो क्राउड फंड से चल रहा है।

इन फिल्मों से कोई कमाई हो पाती है?
रिनचिन: अगर कोई फ़िल्म कमाई कर पाती हैं या रेवेन्यू जनरेट कर पाती हैं तो वो अगले प्रोडक्शन में काम आता है। जैसे हमने मिट्टी नामक फ़िल्म की डबिंग की तो कानपुर के कॉन्ट्रेक्ट वर्कर्स ने इसे देखकर 5000 रुपये का चेक भेजा और कहा कि आपकी अगली फ़िल्म में ये हमारी तरफ से सहयोग राशि है। तुरुप एक दो बार टीवी पर आई है, फेस्टिवल में भी दिखाई गई है। उसको बहुत सराहा गया है।

जो लोग फिल्मों के निर्माण से जुड़े होते हैं, उन्हें पैसा कहां से देते हैं?
रिनचिन: अभी तक जो भी साथी एकतारा में काम कर रहे हैं, वो किसी तरह के काम का पैसा नहीं लेते। वे सभी सामाजिक क्षेत्रों में बदलाव के लिए काम से जुड़े हैं। सभी अपना समय देते हैं और कोई फीस नहीं लेते हैं।

आपका संगठन कोयला खदान क्षेत्र में किन मुद्दों को लेकर काम करता हैं?
रिनचिन: कोयला खदान का जो संगठन है वो दो—तीन मुद्दों पर काम कर रहा है। पहला जो आदिवासियों की अवैध ढंग से ज़मीन छीनी जा रही है। वो बेनामी ट्रांसफर हो या कई बार ज़ोर ज़बरदस्ती से भी होता है। लोग जमीन नहीं देना चाहते हैं। इस जमीन को सरकार कोयला खदानों को दे रही हैं। कंपनियों को परमिशन दी जा रही है और ये कंपनियां लोगों पर दबाव डाल रही हैं। इन इलाकों में आदिवासियों की पुश्तैनी जमीनें बरसों से छीनी जा रही हैं। जबकि कंपनियां यहां आई भी नहीं हैं, कोई काम भी नहीं हुआ है। असल में जिस तरह का हमारा समाज है वो जातिगत विषमता से भरा हुआ है और धोखाधड़ी से आदिवासियों को जमीनों से बेदखल करने का काम किया जा रहा है।

इसमें आदिवासी किस तरह परेशान हो रहे हैं?
रिनचिन: बहुत सारे आदिवासी जंगल पर निर्भर हैं। उन्होंने जंगल की जमीन को काम लायक बनाया है, वे उस पर खेती करते हैं। अब उनको कहा जा रहा है कि जंगल की ज़मीन पर आदिवासियों का कोई अधिकार नहीं है। भारत सरकार का फॉरेस्ट राइट्स कानून सालों से जंगल में रहने वाले लोगों को ये अधिकार देता है कि वो ज़मीन उनकी है उस पर वो खेती कर सकते हैं। मालिकाना तौर पर उनको ज़मीन के पट्टे मिलना चाहिए और उन्हें जंगल से कोई नहीं निकाल सकता है।

कानून है तो उसके आधार पर ही सरकार काम करेगी, कंपनियों को जो जमीन दी गई वो भी कानून के हिसाब से ही दी गई, इसमें कहां दिक्कत है?
रिनचिन: ये कानूनी अधिकार हैं आदिवासियों के, लेकिन जो कानून है या सरकार की बाते हैं वो असल में खोखली हैं। वो सिर्फ किताबो में लिखी हैं, जमीनी स्तर पर उसका कोई वजूद नहीं है।सरकार लोगों को जमीन के पट्टे न देकर कंपनियों को दे रही है।

इस पूरे जमीन के बंदरबांट में महिलाओं की स्थिति क्या है?
रिनचिन: इसमें महिलाओं का मुद्दा सबसे बड़ा है। महिलाएं बहुत प्रभावित हो रही हैं। महिला के पास जमीन नहीं होती और न उनके नाम पर ज़मीन के पट्टे होते हैं। अगर उनके परिवार से बुजुर्ग या कोई पुरुष उस ज़मीन को बेच दे तो वो कुछ नहीं बोल सकती हैं। ज़मीन के पट्टे भी उनके नाम पर नहीं होते हैं। न उनको कोई अधिकार दिया जाता कि वो कुछ बोल सकें। सरकार भी उनकी बात नहीं सुनती है। जबकि हकीकत यह है कि जमीन के बारे में महिलाएं ज्यादा जानती हैं। जमीन की कीमत क्या है और उसकी जरूरत क्या है, यह महिलाओं को पता है। उन्हें पता है कि ज़मीन और जंगल कैसे जुड़ा हुआ है और ज़्यादा काम भी वो ही करती हैं। छत्तीसगढ़ में भी महिलाएं किसानी करती हैं, जिसमें वो धान बोती हैं। महुआ, तेंदू पत्ता तोड़कर उससे कमाकर अपना जीवन चलती हैं। खेती और परिवार चलाने में महिलाएं अपना योगदान देती हैं, उसके बाद भी उनकी भागेदारी उनके सहयोग को इतना महत्व नहीं दिया जाता है। ना जमीन का मालिकाना अधिकार उनको दिया जाता है।

कोयला खदानों के आसपास और किस तरह की दिक्कतें हैं?
रिनचिन: छत्तीसगढ़ में कोयला खदानों के आसपास रह रहे लोगों को स्वास्थ से जुड़ी परेशानियां हो रही हैं। सरकार पर्यावरण नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है। कंपनियां कोयला खदान में खनन करती हैं, तो आदिवासियों के जीवन पर जो प्रभाव पड़ता है। कंपनियां एक तरफ पूरे जंगल को हटा रही हैं, इससे पानी, मिट्टी, हवा में प्रदूषण फैल रहा है। कंपनियां ज्यादा लाभ के लालच में आकर भारी मात्रा में खान करती हैं, जो वैज्ञानिक तरीका नहीं है और इससे पर्यावरण असंतुलन पैदा हो रहा है।

इस सारे मामले में आप या आपका संगठन कैसे हस्तक्षेप करता है?
रिनचिन: हमारा संगठन आदिवासी परिवारों के साथ मिलकर पैरवी का काम करते हैं। भारी मात्रा में कंपनियों की वजह से प्रदूषण फैल रहा है, उसके खिलाफ महिलाएं आगे आकर पैरवी करती हैं। हम लिखने पढ़ने में उनका सहयोग करते हैं। जैसे हाल ही में गांव में बहुत प्रदूषण हो रहा था और पर्यावरण के नियमों का उल्लंघन हो रहा था, तो महिलाओं ने अपने गांव का पानी जमीन से लेकर खुद सेंपल लिया और डाटा इकट्ठा किया। यहां जिंदल कंपनी ने ज्यादा मात्रा में खनन किया और राख फैंकी है, जिसके चलते पानी, ज़मीन और हवा में प्रदूषण फैल रहा है। इस मुद्दे को लेकर महिलाओ ने भोपाल में 2014 में केस लगाया। यह 4 साल चला। बहुत बार तो कोर्ट ने गांव में अलग अलग कमेटियां भी भेजीं। कंपनियां हर बार हमारी बातों को झूठा साबित कर देती थीं। कमेटियां हर बार अलग डाटा मांगती थीं और बार बार परेशान करती थीं। आखिर में कोर्ट का फैसला गांव वालों की तरफ आया और कंपनियों पर 160 करोड़ का जुर्माना लगा। हालांकि जमीनी स्तर पर यह फैसले लागू नहीं हो पाते हैं। अभी हमारी इन फैसलों के जमीन पर उतारने की लड़ाई जारी है।

यह बड़ा फैसला है, इसके लिए महिलाओं को एकजुट करना और उनका जो संघर्ष है, क्या उसको रोकने के लिए भी सरकार की ओर से कोई दमन होता है?
रिनचिन: जब भी महिलाएं काम करती हैं तो सामाजिक ताकतें महिलाओं के खिलाफ कायम रहती हैं। जब भी परिवार या समाज से हटकर महिलाएं काम करती हैं, तो परेशानियां आती हैं।एक उदाहरण मैं आपको देना चाहूंगी। घर से निकलने से लेकर यात्रा करके कहीं तक पहुंचने का सफर चुनौतियों से भरा होता है। अंजान शहरों में रात को निकलना, कहीं आना—जाना यही बहुत चुनौतीपूर्ण काम है। खास कर हम महिलाओं के अंदर इस तरह के सवाल आते रहते हैं कि अंजान शहर में कहां जाएंगे, कहाँ रुकेंगे, क्या करेंगे, कैसे करेंगे। ऐसे सवाल आते हैं। इसी क्रम में जब हम सरकार या उन ताकतों के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं, चाहे वो मज़दूर वर्ग हो या महिलाएं हों, अपने अधिकार को पाने के लिए वो धरना—प्रदर्शन, आंदोलन, रैलियां करते हैं। तो इसके खिलाफ सरकार की ओर से या उन ताकतों की ओर से अलगअलग प्रतिक्रिया होती है। ऐसा करने पर कई केस लगे हैं। गाँव की महिलाएं जो सरकार की नीतियों के खिलाफ उठ खड़ी हुई हैं, उनमें से ज़्यादातर पर केस लगा है। ये सब करते हुए घर परिवार से भी दबाव आता है। इन दबावों के बावजूद महिलाओं का हौसला कम नहीं होता। हम सब भी उस हौसले से और महिलाओं की हिम्मत से इन ताकतवर लोगों से लड़ पा रहे हैं।

इस समय जो राजकीय दमन है, उसके खिलाफ आपकी रणनीति क्या है?
रिनचिन: सभी के मुद्दों को समझना, एक साथ इकट्ठे होना और हम सब किस चीज़ के खिलाफ लड़ रहे हैं उसको समझना, यही रणनीति है। जब कोई महिला किसी तरह की लड़ाई से जुड़ती है, तो वो सिर्फ खुद के मुद्दे के लिए नहीं जुड़ती है, वो लड़ती है ​पित्तसत्तात्मक समाज के खिलाफ, संविधान के नियमों का पालन करने के लिए, समता और समानता के लिए, गैरबराबरी न हो उसके लिए, तो इन सबको इकट्ठा आने की ज़रूरत है।

ये इकट्ठा होना क्या है, महिलाओं को इकट्ठा होना होगा या सभी को?
रिनचिन: देखिये, अगर कोई तथाकथित सवर्ण महिला है, तो उसे भी जाति के खिलाफ या जातिवाद के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। ब्रम्हणवादी, पितृसत्ता से जुड़ी जो हिंदूवादी ताकतें हैं, उनके खिलाफ सभी को एक जुट होकर आगे आना होगा। आप खाली महिलाओं के मुद्दों पर लड़ोगे, बाकी चीज़ों पर नहीं लड़ोगे, आप जाति के भेदभाव को टक्कर नहीं दोगे और ये बोलेंगे कि महिला को बरबरी का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन आप धार्मिक हिंसा के खिलाफ नहीं खड़े होंगे तो यह लड़ाई सफलतापूर्वक नहीं लड़ी जा सकती है। गुजरात में हुए दंगों में मुस्लिम महिला के साथ लैंगिक हिंसा हुई, शोषण हुआ तो अगर हिंदू महिला या अन्य धर्मों की महिलाएं खड़ी नहीं होंगी तो हम महिला के साथ होने वाली हिंसा से नहीं जीत पाएंगे। जब आदिवासी इलाके बस्तर में दलित महिला के साथ हिंसा या उसका शोषण होता है तो हम सब पर उसका असर और फर्क पढ़ना चाहिए। अगर हम समता मूलक समाज बनाना चाहते हैं, तो इसके खिलाफ जो ताकतें दमन करती हैं, जैसे ब्राम्हणवादी, कारपोरेट, हिंदूवादी, पूंजीवादी ताकतें, इनके खिलाफ हम सबको मिल जुलकर लड़ाई लड़नी होगी।