अजब कहानी शहरों के विकास की

(अब ऐसा समय आ गया है जिसमें हमें विकास की अपनी समझ की गलती दिखाई देने लगी हैलेकिन फिर भी हम उसे मानना नहीं चाहते। यदि मान लेते तो शायद उसे बदलना नहींतो कमसेकम सुधारना शुरु हो गया होता। ऐसे में कुछ आवाजें हमें बारबार अपनी गलती का अहसास करवाती रहती हैं। प्रस्‍तुत हैइसी अहसास पर हिमालय में सक्रिय संस्‍था ‘हिमाल’ के अध्यक्ष रमेश मुमुक्षु का यह लेख।)

शुरुआत में शहर धीमेधीमेबेआवाज बढ़ता है। खेत, खलिहान, जलस्रोत, जोहड़, तालाब, झील निगलता हैगाडियां सरपट दौड़ेंइसकी कोशिश करता है। एक बार शहर सुंदर हो गया तो उसको पर्यावरण की याद आने लगती है। अपने आसपास सब ठीक रहेजगत भले विनाश की ओर जाए। वो मैप देखता है और वहीं जाता हैजहां पर ‘सिक्स लेन’ और ‘फोर लेन’ की सड़क सरपट एसयूवी को ले जाये और किसी बड़े मोटल में रेस्ट करके आगे सरपट हो जाये। मेरे घर के पास नहींइसको दूसरे के घर ले जाओ। मुझे नहीं चाहिए पुलकारखाना। मेरे घर के बाजू में नहीं चाहिएभले ही किसी और के घर के बाहर कुछ भी हो। जिसकी चलती हैवो रास्ते बदल देता है। एक फार्म हाउस के लिए सरकारी सड़क बदल जाती है। समग्रता से सोचना हम छोड़ चुके हैंहम केवल अपने लिए ही सोचते हैं।

गंगोत्री के रास्ते में देवदार के हजारों पेड कटेकोई अंतर नहींहमारी गाड़ी सरपट दौड़नी चाहिए। देवदार 100 साल में बढ़ता है। वह पिलखन नहीं हैजो दूसरे दशक में ही विशालकाय हो जाता है। मानेसर तक 21 किलोमीटर लंबे और छह मीटर चौड़े कांक्रीट और ऊंची मंजिलों से भरपूर ‘द्वारका एक्सप्रेस वे’ देखा तो मुझे लगाये जिन्‍न के दिए के जादू की तरह कहाँ से अवतरित हो गया। खेतखलिहान और न जाने कितने जलस्रोत स्वाहा हो गएइस विकास की यात्रा मेंलेकिन ताज्जुब हैकिसी की उफ तक नहीं आई। जिन्होंने वहां पर फ्लैट लिए वो कहते आ रहे हैं कि जल्दी ही कनेक्टिविटी हो जाएगी। सदियों से पुरखों द्वारा तैयार की गई खेती की उत्‍पादक जमीन कांक्रीट में तब्दील हो गई है। ये सब महानगर की त्रासदी है। ये विकास सच्चाई अथवा अनिवार्य हैयह कौन तय करेगा?

कौन द्वारका आना चाहता थामेट्रो बनी तो डीलर की भाषा में कनेक्टिविटी से रेट बढ़ गए। अब कहते हैं, ‘द्वारका एक्सप्रेस वे’ की कनेक्टिविटी बनी तो फिर क्या है?  पानी का एक बहुत विशाल और न ख़त्म होने वाला स्रोत नजफगढ़ झील हैलेकिन विकास और अदूरदर्शिता से वो भी संकट में है। विकास की बेतरतीव रफ्तार ने साहिबी/साबी नदी को रेवाड़ी के मसानी बैराज तक ही सीमित कर दिया है। अभी नजफगढ़ झील में सारा पानी विश्वप्रसिद्ध गुरुग्राम के सीवर से आकर इकट्ठा होता है। हालांकि अभी झील में रिचार्ज भी होने लगा हैलेकिन किसी को कुछ लेनादेना नहीं। विदेशी पक्षी यहाँ पर बहुत बड़ी तादाद में आते रहे हैं। ये प्राकृतिक अवसादनेचुरल डिप्रेशन है। ये खादर का इलाका है। वर्षा में जलभराव होता है और धीमेधीमे वो चेनल के द्वारा यमुना नदी में जाता हैजिसको खोदकर गहरा और चौड़ा करके नजफगढ़ नाला बनता है। इसके अंदर वजीराबाद तक करीब 35 से ऊपर गंदे नाले गिरते हैंजो यमुना नदी को दूषित करते हैंलेकिन हम सब भूल गए हैं। हम को केवल ‘फोर बीएचकेपेंटहाउसडुप्लेक्स जैसे शब्द ही याद रह गए हैं। पानी कहाँ से आयेगाकोई परवाह नहीं। गुरुग्राम के लगभग सभी प्राकृतिक स्रोत खत्म हो चुके हैं। यमुना और गंगा के पानी पर निगाहें हैजबकि हिमालय के 285 विकासखंड पानी की कमी को झेल रहे हैं। जब प्राकृतिक स्रोत पर संकट आता हैतो नदी में पानी कैसे बढ सकेगा। लेकिन इतना कौन सोचेअपना घर बचना चाहिएदूसरे का जाता हैतो हमें क्या लेनादेना?

कब आएगी ये आवाज कि हमें नहीं चाहिए हिमालय में कोई और बड़ा बांधनहीं चाहिए कोई बड़ी खदाननहीं चाहिए बड़े कारखाने और हवाईअड्डेनहीं फोड़ना हैपर्वत के सीने कोनहीं घेरना हैसागर तटनहीं चाहिए मुझेउच्च हिमालय पर पर्यटन और नहीं चाहिए मुझे सारे संसाधन मेरे घर पर। विकास होलेकिन प्राकृतिक संवर्धन के साथ सतत विकास ही एक मात्र उद्देश्य हो। मेरा घरमोहल्लाशहर भी बचें और दूसरे की भी हम सोचेंऐसा ‘माइंड सेट’ होना है। समग्रता से चिंतन करना है। द्वारका के विकास का असर कहाँ पर होगाहम पानी किस नदी से लेंगेउस नदी के उदगम से सागर तक जाने के क्या हाल हैंनदी के किनारों पर कब्जे तो नहीं हैंसागर के किनारों को हम घेर तो नहीं रहे। उच्च हिमालय को हम छेड़ तो नहीं रहेजहां सीटी बजाने भर से ही पत्थर भरभरा के गिरने लगते हैं।

कहीं और विकास को देख हम खुश होते हैंलेकिन मेरे घर के पास कुछ हुआ तो मैं दुःखी हो उठता हूँ। ये ‘होलिस्टिक’ सोच नहीं है। हम तो जड़चेतनसूक्ष्मअतिसूक्ष्म की भी कामना करते हैं। समस्त पृथ्वी एवं ब्रह्मांड की चिंता और स्तुति करते हैंतो हम संकुचित क्यों सोचेनागरिक और सरकार को इस संकुचित सोच से उबरना होगा। किसी भी विकास परियोजना को जनता के सामने रखें और खुलकर चर्चा होतो विरोध की जरूरत ही नहीं होगी। विकास के साथ प्राकृतिक स्रोत का संरक्षणसंवर्धन पहली शर्त होनी चाहिए। कूड़े का निस्तारण कैसे होगादूषित जल का प्रबंध कैसे होगाजल का अनुकूलतम एवं अधिकतम उपयोग कैसे होगाऐसी सोच के बिना समग्र एवं सततटिकाऊ विकास संभव ही नहीं है।

अभी ‘पर्यावरण इम्‍पैक्‍ट असेसमेंट-2020’ (ईआईए-2020) जैसाकातैसा लागू हुआ तो शिकायत भी नहीं हो सकेगीये भी हम सबको सोचना ही होगा। एक बात याद रखें कि कोई भी परियोजना ‘जनहित’ के नाम पर ही बनती हैजबकि जनता ने तो नहीं बोला और न ही उससे पूछा गया। इस पर हम सबको आगे आकर काम करना है। मुझे पुल नहीं चाहिएसड़क नहीं चाहियेदूसरी ओर ले जाओमुझे बरसों ये सोच अधूरी जगी है। जहां ले जाओगेउसके बारे में भी सोचो कि वहां पर क्या होगालेकिन मेरी बला सेकहीं भी जाए।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए कोई भी प्रतिकार होउसका स्वागत तो होना ही चाहिएलेकिन हमारा दृष्टिकोण समग्र और सतत विकास की अवधारणा पर टिका हुआ होना चाहिए। सरकारठेकेदार और विकास के पुरोधा हमारी इसी संकुचित सोच का लाभ उठाते है। हमें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देते हैं। जब तक हम छोटा सोचेंगेउतना ही हमको अनदेखा किया जाएगा। मेरे घर के पास नहींमेरे घर से दूर ले जाओक्योंकि आखिर ये मेरा ही है। मुझे अपना पेड़ बचाना हैभले दूसरों के जंगल साफ हो जाएं। मुझे सभी ओर सरपट दौड़ने वाली सड़कपुल और ऊंचे पर्वतों पर रहने के लिए आरामगाह चाहिए। सरकार पहले सपना दिखाती हैसब सपने में मग्न हो जाते हैं। जब तक सपना किसी और के विनाश का होता हैतो कोई एतराज नहींलेकिन जब गाज अपने सिर पर गिरने लगती है तो बरबस सब कुछ याद आने लगता है। बस मैं ही बचूंमेरा पेड़मेरा गांवमेरा शहरमेरी शांतिये सब चलता है।

(सर्वोदय प्रेस सर्विस से साभार)