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DelhiCAAClashes: दिल्ली के नरसंहार के बाद क्या!

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सचिन श्रीवास्तव, भोपाल

होने को तो कुछ भी हो सकता है। देश भी जल सकता था, लेकिन दूसरे पक्ष ने जिस तरह शांति का परिचय दिया है, उसका ऐहतराम किया जाना चाहिए। अफवाह और सच के बीच यह तथ्य तो साबित हो ही चुका था कि कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार, मोदी समर्थक और भाजपाई दिमागों ने इस पूरी हिंसा में अग्रिम भूमिका निभाई है। आगे की जांच में जो भी तथ्य आएंगे, पहली नजर में लगता है कि वो इसी के आसपास होंगे। धार्मिक स्थलों पर चढ़कर झंडे फहराना, तोड़फोड़, लिंचिंग और चंद युवाओं को घेरकर पुलिस की पिटाई के दृश्य विचलित करने वाले हैं और इस बीच खबर मिली है कि महिलाओं पर यौन हिंसा की घटनाओं को भी अंजाम दिया गया है। महिलाएं और बच्चे इन गुंडों की जोर आजमाइश का बड़ा शिकार होंगे।

इन घटनाओं के जिम्मेदारों के कुछ नाम सामने आए हैं, आगे और भी आएंगे। हमारी न्याय व्यवस्था में कैसे इन दोषियों को सजा मिलेगी, इसके बारे हालात नकारात्मक ही लगते हैं। दिक्कत यह भी है कि जो हुडदंगी सड़क पर हैं, उनकी उम्र 14 से 18—20 साल तक के ज्यादा हैं। जाहिर है इनके पीछे कई लोग होंगे जो इन्हें संचालित कर रहे हैं और जो हिंसक हरकतों को बचाने के लिए भी तत्पर रहेंगे। राज्य प्रायोजित इस हिंसा की अलग—अलग परतें उधड़ती रहेंगे लेकिन फिलहाल बड़ा सवाल है कि आगे क्या यह हिंसा तेज होगी, या फिर इसे तुरंत काबू किया जाएगा। केंद्र सरकार जिस तरह से मूक दर्शक की भूमिका में है और भाजपाई नेताओं की जो भंगिमा है, वह साफ कर रही है कि 1984 की दिल्ली, 1992 की मुंबई और 2002 के गुजरात की लिस्ट में 2020 की दिल्ली भी शामिल हो चुकी है। आने वाले वक्त में इस नरसंहार को हम फिर शर्मिंदगी और शोक के साथ याद करेंगे। मरने वालों में हिंदू—मुस्लिम छांटने वालों के लिए न कभी किसी हिंसा से सबक मिला है, न मिलेगा। राजनीतिक रोटियां पहले भी सिंकती रही हैं, आगे भी सेंकी जाएंगी। लेकिन फिलवक्त बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा हिंसक दौर का अंत क्या है!

पहली बात तो पुलिस चाहे तो दो घंटे में हुडदंगियों पर काबू पा सकती है, लेकिन फिलहाल उसकी ऐसी कोई मंशा लगती नहीं हैं। दूसरे अभी तक जो हिंसा हुई है, वह सत्ता प्रतिष्ठानों से दूर हुई है। सांप्रदायिक हिंसाओं का इतिहास बताता है कि गरीब, दलित, अल्पसंख्यक बस्तियों में होने वाली हिंसा सत्ता के लिए मुफीद रहती है, इसलिए कोई भी सत्ता इन्हें रोकने के प्रति उस शिद्धत से आगे नहीं आती जैसा व्यापारिक प्रतिष्ठानों और सत्ता के गलियारों तक आती आग को बुझाने में प्रशासन मुस्तैद होता है। यही भीड़ अगर लुटियन्स दिल्ली में उत्पात मचा रही होती तो पुलिस की वाटर कैनों और आंसू गैस के गोलों की बारिश हो चुकी होती।

उम्मीद की जानी चाहिए कि जनता की बर्बादी से अपनी जड़ें मजबूत करने वाली सत्ता जल्द चेतेगी और इस आग को काबू में करने की अपनी जिम्मेदारी को समझेगी। वरना देश को गृह युद्ध की तरफ ले जाने के मंसूबे तो कामयाब होते दिख ही रहे हैं। अच्छी बात यह है कि अभी तक दूसरे पक्ष ने अपनी शांति को बनाए रखा है और उदार, लोकतांत्रिक ताकतों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए शांति के प्रयासों को तेज किया है।