Transgender

Transgender – कोरोना का असर: खेती से मतदान की अपील तक के कामों में जुटा ट्रांसजेंडर समुदाय

सचिन श्रीवास्तव
भोपाल।
कोरोना ने समाज के सभी वर्गों से रोजगार छीना है। ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय भी इससे अछूता नहीं रहा। ट्रांस (Transgender) समुदाय के लिए अपना रोजगार बदलना अन्य वर्गों की अपेक्षा खासा मुश्किल होता है। समाज का नजरिया उनके प्रति बेहद तकलीफ पैदा करने वाला है। कोरोना काल में लोगों ने इस समुदाय से अपनी सामाजिक दूरी कई गुना बढ़ा ली है। ऐसे में हालात और मुश्किल हो चुके हैं, लेकिन अब ट्रांस (Transgender) समुदाय ने इससे पार पाने की कवायदें भी शुरू कर दी हैं।

बधाई राशि में कमी, तो खेती की ओर किया रुख
ट्रांस (Transgender) समुदाय के लिए दूसरे काम करने में खासी सामाजिक मुश्किलों से गुजरना पड़ता है, लेकिन कोरोना काल में बधाई राशि में कमी के कारण आजीविका के लिए दूसरे कामों की ओर रुख कर रहे हैं। हाल ही में गुना के महावीरपुरा में रहने वाली गुरु बन्नो और उनके 25 शिष्यों ने बागरोदा गांव में 15 बीघा के खेत में खुद ही सोयाबीन की बुआई कराई। इससे पहले वे इसे बटाई पर देती थीं। अब वह फसल पककर तैयार हो चुकी है। इसमें करीब 20 से 25 क्विंटल सोयाबीन उत्पादन का अनुमान है।

दतिया में करेंगे मतदान के लिए प्रचार
कोरोना के कारण कमाई का असर ट्रांस (Transgender) समुदाय पर काफी पड़ा है। ऐसे में उन्होंने अब कमाई के दूसरे रास्ते पर भी ध्यान दिया है। सीधी राजनीति से दूर रहने वाले ट्रांस (Transgender) समुदाय के साथी अब मतदान के लिए प्रचार करते दिखाई देंगे। मध्य प्रदेश में इन दिनों विधानसभा उपचुनाव की तैयारी चल रही है। कोरोना काल में मतदान प्रतिशत बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। हालात यह हैं कि पिछले चुनाव के बराबर मतदान हो तो भी इसे अच्छा माना जाएगा। ऐसे में प्रशासन ने ट्रांस (Transgender) समुदाय की मदद ली है। ट्रांस (Transgender) समुदाय किसी पार्टी का प्रचार तो नहीं करेंगे, लेकिन प्रशासन को मतदान प्रतिशत बढ़ाने में मदद करेंगे। वे टोलियां बनाकर घर-घर जाकर गली मोहल्लों में मतदान करने की अपील करेंगे।

दूसरे काम करना खासा मुश्किल
यह दो उदाहरण ताजगी तो देते हैं, लेकिन हालात में बहुत ज्यादा बदलाव आएगा, ऐसा नहीं लगता। देश की पहली ट्रांस (Transgender) विधायक शबनम मौसी मध्य प्रदेश की थीं और सरकारी नौकरी पाने वाली पहली ट्रांसजेंडर संजना सिंह भी भोपाल में ही रहती है, लेकिन इसके बावजूद ट्रांस (Transgender) समुदाय के लिए काम के हालात बिल्कुल नहीं बदले हैं। इस बारे में ट्रांस समुदाय की रज्जो (परिवर्तित नाम) कहती हैं— एक दो नाम तो बस उदाहरण के लिए होते हैं। देश में लाखों ट्रांसजेंडर (Transgender) हैं, उनके लिए तो अभी भी कोई और काम करना नाकों चने चबाने जैसा है।

इस साल पारंपरिक जुलूस की रौनक रही फीकी
रक्षाबंधन के तीसरे दिन ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय हर साल पारंपरिक जुलूस निकालता है, लेकिन इस बार कोविड गाइडलाइन के कारण इसकी रंगत फीकी रही। महज 15 टांस साथियों ने इस परंपरा की रस्म अदायगी की। मिथ के मुताबिक, करीब हजार साल पहले राजाभोज के शासन में सूखा और अकाल पड़ा था तब से ट्रांस (Transgender) समुदाय यहां भुजरिया पर्व मनाता है और अच्छी बारिश की दुआ करता है।

कानून की नहीं है जानकारी
भारत में आधिकारिक रूप से ट्रांसजेंडर (Transgender) की जनसंख्या 49 लाख के करीब है। 2011 में अलग से ट्रांसजेंडर (Transgender) समुदाय की जनगणना में यह आंकड़े सामने आए थे। उसके बाद 2019 में ट्रांसजेंडर के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए ट्रांसजेंडर (Transgender) पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) कानून बनाया गया, लेकिन दिक्कत यह है कि इस कानून के बारे में ट्रांस (Transgender) समुदाय के ज्यादातर सदस्यों को जानकारी ही नहीं है। इस बारे में रज्जो हंसते हुए कहती हैं— हमारे अधिकार क्या हैं, इस बारे में हमारे बजाय समाज के दूसरे तबकों को बताया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा। हम तो बस अपने कर्तव्य जानते हैं कि दूसरों की खुशियों में ही हमें खुश होना है।