Anil Anshuman

हमें याद है चंद्रशेखर की शहादत, हमें बाथे बथानी भी याद है: अनिल अंशुमान (Anil Anshuman)

भाकपा (माले) के सांस्कृतिक मोर्चे के वरिष्ठ कार्यकर्ता अनिल अंशुमान (Anil Anshuman) से विशेष बातचीत

अनिल अंशुमान ने कहा— 
Anil Anshumanकेंद्रीय स्तर पर कारगर जमीनी आंदोलन का मोर्चा सामने आए इसकी कोशिश जारी है। यह चुनाव नहीं जन आंदोलन था, जनता के मुद्दों को केंद्र में लाने का मंच बना चुनाव। हम सीटों के खेल में हारे हैं, लेकिन जनता के सामने नहीं। चुनाव ने दो मॉडल दिए— चुनाव जनता से संवाद का मौका बना, मध्य वर्ग की पार्टियों का वामपंथ से साथ सरकार की कुंजी है। वामपंथियों में ही है जनता से वोट और नोट मांगने का माद्दा। तीनों वाम दलों ने एक दूसरे के लिए लगातार पूरे चुनाव में जद्दोजहद की। कन्हैया पूरे बिहार में घूमते तो बेगूसराय में शायद ये नतीजे न होते। लंबे समय बाद वामपंथी कार्यकर्ताओं ने बूथ लेबल पर काम किया। इस दौर की लड़ाई को बेहद खूबी से अपनाया कार्यकर्ताओं ने। यह मॉडल पूरे देश में लागू होगा। आंदोलन की शर्तों के आधार पर किया गया गठबंधन। जब लोकतंत्र और संविधान पर ही संकट हो तो नागरिकों का मोर्चा जरूरी है। हमारा ही नारा था— भाजपा कांग्रेस दोनों यार, देश बेचने के लिए तैयार। विकल्प जमीन पर बनता है, बंद कमरों में नहीं। उत्तर बिहार में भी वामपंथ अपने पैर पसार रहा है…

बिहार विधानसभा चुनाव में 16 सीट जीतकर वामपंथी राजनीति ने मौजूदा चुनावी राजनीति में एक नई हलचल मचा दी है। अखबारों, टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया और चौक—चौराहों तक इसी चर्चा है। यह 16 सीटें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि महज 29 सीटों पर चुनाव लड़कर वामपंथी पार्टियों ने संसदीय राजनीति में विस्मृत करा दी ताकत का अहसास कराया है। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी यानी भाकपा माले ने 19 में से 12 सीटें जीतकर भी एक नया चुनावी ककहरा लिखा है। वामपंथी के लिए यह जीत क्या मायने रखती है? वामपंथी राजनीति के वर्ग संघर्ष और राजद का जातिगत राजनीति का यह मेल कैसे संभव हुआ? क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाना एक बड़ी मजबूरी है? क्यों वह राजद जिसने भाकपा माले के कार्यकर्ताओं पर खूनी दमन किया, आज वामपंथ को अपनी लग रही है? जमीन पर गठबंधन के हालात क्या थे और क्या यह महागठबंधन आगे भी जारी रहेगा?

ऐसे ही कुछ सवालों पर संविधान लाइव ने भाकपा माले के वरिष्ठ कार्यकर्ता और पार्टी के केंद्रीय सांस्कृतिक मोर्चे के सदस्य व झारखंड के प्रभारी अनिल अंशुमान से बातचीत की। इस बातचीत में अनिल अंशुमन ने बेबाकी और साफदिली से सवालों के जवाब दिए। उन्होंने राजद और कांग्रेस से वामपंथ की दूरियों और दोनों की जरूरत का भी खास ढंग से जिक्र किया, तो वामपंथी राजनीति के नए मुहावरे पर भी बेलौस टिप्पणियां कीं। इस बातचीत को हमारे यूट्यूब चैनल पर सुना जा सकता है, जिसका वीडियो लिंक नीचे है।

इस बातचीत में अनिल अंशुमान कहते हैं कि भाकपा माले ने माना कि यह चुनाव नहीं जन आंदोलन है। इसमें लॉकडाउन में पिसती जनता के सवालों को केंद्र में लाया जा सकता है। हालांकि हमें सत्ता के खेल में जबरिया हमें पीछे धकेल दिया गया है। कई जगहों पर प्रशासन के माध्यम से हमें हरा दिया गया। लेकिन यह चुनाव बेहद खास रहे।

वे कहते हैं कि इस चुनाव में जनता के मुद्दे केंद्र में थे, लेकिन ये मुद्दे हवा में नहीं बने। वामपंथी कार्यकर्ता जो 365 दिन सड़कों पर मुद्दों के लिए लड़ते हैं। वे जमीन पर थे, इसलिए यह मुद्दे भी चुनाव के केंद्र में थे।

अनिल ने कहा कि सबसे पहले वामपंथी दलों ने ही इस चुनाव का विरोध किया था, क्योंकि लॉकडाउन और कोरोना के कारण जनता की कमर टूटी हुई थी। आज भी जांच का पैमाना तय नहीं हो पा रहा है। प्रतिदिन 200 लोगों की भर्ती सिर्फ पटना में हो रही है। इधर डेंगू भी आ गया है। और जनता को आत्मनिर्भर बनाने का खेल जारी है। कुल मिलाकर सरकारों ने जनता को खुले मैदानों में भूखे प्यासे छोड़ दिए हैं।

वे बेबाकी से मानते हैं कि देर सबेर ही सही कम्यूनिस्ट पार्टियां भी चुनाव के लिए तैयार हुईं। और इसके लिए तैयार हुई कि इस मौके को सिर्फ चुनाव नहीं जन आंदोलन का मंच बनाया जाए। क्योंकि सरकारों ने इस दौरान सारे आलोकतांत्रिक काम किए हैं, तो ऐसे में चुनाव सरकार के खिलाफ जनता को एकजुट करने का वक्त था। कई साथियों ने यह भी कहा कि इस दौर में अगर कोई सिर्फ फेसबुक पर पोस्टर पर खड़ा होता है तो क्या होगा। इसलिए इस चुनाव में जमीन पर उतरना जरूरी था।

इस चुनाव के सबक पर फैज का एक शेर
गर बाजी इश्क की बाजी है, जो चाहे लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, और हारे भी तो मात नहीं

को याद करते हुए अनिल ने कहा कि हम सीटों के खेल में हारे हैं, लेकिन जनता के सामने नहीं हारे हैं। इस चुनाव ने एक नहीं दो दो मॉडल दिए हैं। पहला तो यह कि अगर चुनाव को आंदोलन का मंच बना लिया जाए तो जनता से संवाद का शानदार मौका हो सकता है। जिंदगी के जरूरी सवालों का मंच चुनाव बन सकता है। यह इस चुनाव में महागठबंधन ने साबित किया है।

दूसरा, ये कि जब जब मध्य वर्ग की पार्टियों ने वामपंथ को साथ लिया है, तब सरकार बनती है। इस बार भी सरकार बन गई थी लेकिन इसे हराया गया, प्रशासन के जरिये। पहले दो बार सरकार बन चुकी है। इसका सबक ये भी है कि डोर टू डोर कॉन्टेक्ट के जरिये जुड़ना जरूरी है। गठबंधन के कैडर ने बताया कि आप लोग यानी वामपंथियों वाली मेहनत की आदत हमें भी लगना चाहिए। यह ऐसे कि पार्टी से पैसा मिले न मिले, लेकिन वामपंथी कार्यकर्ता में वह माद्दा है कि वे जनता से वोट भी मांगते हैं, और नोट भी मांगते हैं। यानी जनता के पैसे से ही जनता का चुनाव लड़ा जाता है। यह अनुभव महागठबंधन के कार्यकर्ताओं को सीखने को मिला। वहीं दूसरी ओर लेफ्ट के लोगों में दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिए, का जो चलन था, वह इससे बाहर निकले हैं। तीनों वाम दलों ने एक दूसरे के लिए लगातार पूरे चुनाव में जद्दोजहद की है।

कन्हैया के भाकपा माले के प्रचार में न आने के सवाल पर अनिल ने खूबसूरती से इसे रणनीतिक जामा पहनाते हुए कहा कि कन्हैया एमएल के प्रचार में नहीं आए यह सवाल कई बार कई तरह से किया गया। लेकिन कन्हैया अगर आते और बेगूसराय में न भिड़ते तो दो सीट जो आईं वहां, इसमें दिक्कत हो जाती। कन्हैया वर्तमान राजनीति का बड़ा और जरूरी चेहरा हैं और उसी तरह राजू यादव आरा में लगे थे उन्हें भी बाहर नहीं निकलने दिया। उन्हें वहीं अपनी जिम्मेदारी निभानी थी।

अनिल कहते हैं कि लंबे समय बाद वामपंथी कार्यकर्ताओं ने बूथ लेबल पर काम किया है। हम लोग पहली बार सोशल मीडिया वार, सोशल मीडिया अभियान, बूथ वाइज कैडर खड़ा करना ये सब काम किए हैं। यह काम बेहद उत्साह से कार्यकर्ताओं ने किया। वामपंथ ने इस दौर की लड़ाई को बेहद खूबी से अपनाया है। आसान भाषा में कहें तो 20—20 की प्रैक्टिस की है।

वे आगे उत्साह के साथ बताते हैं कि यह मॉडल बंपर ढंग से पूरे देश में लागू होगा। और भाकपा माले तो इसे पूरे देश में लागू करेगी ही। बिहार और झारखंड में तो सभी मानते हैं कि सक्रिय रूप से काम करने वाली पार्टी माले ही है। इस चुनाव में एआईएसएफ के साथियों से कुछ हमने सीखा, कुछ उन्होंने। यह काम आगे बढ़ना ही है। उन्होंने बताया कि अब आगे कार्यकर्ता 19 लाख रोजगार पर आंदोलन की रणनीति बनाने लगे हैं और सड़क पर उतरेंगे। यह सिर्फ रोजगार का नहीं, सम्मानजनक रोजगार का सवाल है।

आगे उन्होंने कहा कि ये गठबंधन लगभग न होते होते हो गया। राजद की ओर से लग रहा था कि जैसे लालू जी के समय में होता था कि कुछ सीटें दे दी और हो गया, वैसे ही होगा। लेकिन यह गठबंधन जमीनी सक्रियता के जरिये तय हुआ है। हम लोगों ने 30 सीटों का एनाउंसमेंट पहले ही कर दिया था। चूंकि हमारी प्रक्रिया चालू थी। जिला स्तर पर राजद नेतृत्व ने अपने केंद्रीय नेतृत्व पर बहुत दबाव डाला और आखिर राबड़ी जी के आवास पर दीपंकर जी को बुलाया और फिर आंदोलन की शर्तों के आधार पर गठबंधन किया गया।

राजद के साथ माले के रिश्तों पर वे कहते हैं कि सब याद रख्खा जाएगा ये तो कहते ही हैं। तो हमें याद है चंद्रशेखर की शहादत, हमें बाथे बथानी का नरसंहार भी याद है। मीडिया ने इस दौर में भी कई खबरों को दबाया लेकिन सामंती दबंग ताकतों ने हम पर हमले चुनाव के दौरान भी जारी रखे हैं। इसलिए संघर्ष की हमारी धारा है वह जारी रहेगी।

असल में जमीन पर कैसे संभव हुआ, तो आप देखिये कि आज सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबड़े, स्टेन स्वामी समेत दर्जनों कार्यकर्ता जेल में हैं, लेकिन अर्णब के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत रिहाई दे दी। तो हम चंद्रशेखर से बाथे बथानी की केस रिपोर्ट दबाने वाली राजद का कार्यकाल याद है, लेकिन अब राजद के घोषणापत्र में इसीलिए था कि जनआंदोलनों को कमजोर करने वाली ताकतों के खिलाफ सख्ती होगी। जहां तक शाहबुद्दीन का वाल है तो उसके खिलाफ कभी हमने अपना पक्ष कमजोर नहीं होने दिया। लेकिन शाहबुद्दीन राजद के नेतृत्वकर्ता नहीं थे और उन्होंने जो किया वह भुगत रहे हैं। आगे भी कोई ऐसा करेगा तो उसका जवाब देंगे। इस बार ये जरूरी था कि लड़ने का आप्शन रहे। मौजूदा सरकार में तो लोकतंत्र संविधान खत्म करने की बात हो रही है। तो ऐसे माहौल में तो नागरिकों का मोर्चा बनाना होगा।

कांग्रेस पर बोले कि एक बड़ी लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ आना जरूरी है। हमारा तो नारा ही था कि भाजपा कांग्रेस दोनों यार, देश बेचने के लिए तैयार। उन्हें हम जोड़ने नहीं गए, वे खुद आए हैं। उदारीकरण की उन्हीं की बिछाई पटरी पर यह रेल दौड़ रही है प्राइवेटाइजेशन की। यह हमें पता है। लेकिन चूंकि विपक्ष का महागठबंधन बने यह ज्यादा जरूरी है। अभी भी कांग्रेस का जनाधार है, उसमें अभी भी सेक्यूलर लोग हैं।

अनिल ने कहा कि माले और राजद का जनाधार एक ही है। आज वह दायरा टूटा। कुछ भ्रम भी थे, वे भी टूटे। राजद और वामपंथ ने अपने वोट कनवर्ट किए। लेकिन इसी के साथ महागठबंधन का फायदा कांग्रेस नहीं उठा सकी। जनता से जुड़ी राजनीति में कोई पार्टी कमजोर होती है, तो फिर उसे सीटों में कन्वर्ट करना मुश्किल होता है। हालांकि वह 20 सीट लाई है, तो संभावना तो है।

वैसे भी कॉमरेड विनोद मिश्र के शब्दों में कहें तो विकल्प जमीन पर बनता है, बंद कमरों में नहीं बनता है। तो इस हार के बावजूद वामपंथी कार्यकर्ता हताश नहीं हैं, बल्कि तेवर में हैं।

अनिल ने कहा कि उत्तर बिहार में भी वामपंथ अपने पैर पसार रहा है। दरभंगा, मधुबनी, आदि में एक समय किसान आंदोलन रहा। लेकिन संगठनात्मक कमजोरी है। यह चुनाव उसे गति देगा। सीमाचंल और मिथलांचल में जल्द ही मजबूती मिलेगी। सीमांचल में औवेसी फैक्टर आया और वहां मुस्लिम साथियों के क्या सवाल हैं। उसे देखेंगे। झारखंड में भी महागठबंधन ने दो सीट जीती हैं। यह महागठबंधन की बिल्कुल नई प्रैक्टिस है। वहां भी हम मानते हैं कि नया स्वरूप लेगा। झारखंड में जनमुद्दों पर लड़ाई जारी है। लेकिन भाजपा की शैली में नहीं लडेंगे।

आखिर में अनिल ने साफ किया कि वामपंथी केंद्रीय नेतृत्व लगातार बात कर रहा है कि कैसे एक मोर्चा बने। बंगाल में भी जल्द इस तरह के गठबंधन का स्वरूप सामने आएगा। वहां एक मुश्किल काम है कि विपक्ष का वोट न बिखरे, लेकिन वहां भी कोशिश की जाएगी। डेडलॉक नहीं किया जाए यह जरूरी है। केंद्रीय स्तर पर कारगर मोर्चा और जमीनी आंदोलन का मोर्चा सामने आए इसकी कोशिश जारी है, इसी के जरिये भाजपा को परास्त किया जा सकता है।