चंद कड़वी सच्चाइयां: बदलनी होगी सीएए विरोध की शक्ल

सचिन श्रीवास्तव
दिल्ली में हिंसा हो चुकी है और सीएए विरोध की शाहीन बागों से निकली लहर अब आग पर सवार है। किसने आग लगाई, किसने भड़काई, कौन बुझाने आया जैसे सवालों के जवाब तलाशने जरूरी हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जब देश का एक हिस्सा जल उठा है और अन्य इलाके भी बारूद के ढेर पर बैठे हैं, तो आगे क्या किया जाए!

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30 जनवरी 2020 को भोपाल के इकबाल मैदान में हुई राज्यस्तरीय रैली का दृश्य.

देशप्रेम और देशद्रोह की नई अवधारणाओं में जब यह तय हो चुका है कि भाजपा नीत केंद्र सरकार के कदमों की सराहना करना ही देश प्रेम है और इस पर किसी भी तरह का सवाल उठाना देश द्रोह है, तो अब सवाल उठता है कि
इन कथित देश द्रोहियों को क्या करना चाहिए? (जिनमें इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल है।)
वह कौन सी प्रावधियां हैं, जिनसे देश की खूबसूरती, मूल आत्मा और इंसानियत को बचाने की अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी को एक संवेदनशील नागरिक पूरा कर सकता है?

इन सवालों के जरिये आगे की राह बनाने से पहले हमें चंद कड़वी सच्चाइयों से रूबरू होना होगा।

दिल्ली के नरसंहार की आहट 11 फरवरी को मिलनी शुरू हो गई थी और किसी को यह मुगालता नहीं था कि भाजपा और संघ परिवार की ओर से दिल्ली को अपनी प्रयोगशाला जरूर बनाया जाएगा। केंद्र सरकार की शह से शेर हुए भाजपा कार्यकर्ता और बड़बोले नेता शाहीन बागों पर बीते दो महीने से जिस तरह की टिप्पणी कर रहे थे, उससे भी साफ था कि खतरा बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसके लिए मुस्लिम समाज तो छोड़िये हमारे डेमोक्रेटिक, उदार, बौद्धिक तबके ने भी जरूरी ऐहतियात नहीं बरती।

Iqbal Maidaan-1बीते दो महीनों में सीएए विरोध की मूल प्रावधियां विभिन्न शहरों में धरने, छोटी—छोटी गोष्ठियां, नुक्कड़ सभाओं और चंद रैलियों की शक्ल में सामने आई हैं। इस दौरान भी बड़ी जनता की लामबंदी के प्रयास या तो बहुत सीमित हुए हैं, या फिर हुए ही नहीं हैं। आदिवासी और दलित समूहों, जो एनपीआर से जुड़ी एनआरसी का सबसे बड़ा भुक्तभोगी होने वाला है, उसे इस आंदोलन में सक्रिय रूप से जोड़ने की कोई ठोस कोशिश दिखाई नहीं देती। न ही वामपंथी पार्टियों ने अपने कैडर को आंदोलन में जमीनी रूप से जुड़ने की कोई प्रक्रिया अपनाई है। इनके चंद नेता जरूर देश भर के शाहीन बागों, सत्याग्रहों, धरनों, प्रदर्शनों में शरीक होते रहे, लेकिन मौटे तौर पर उनका काम चंद भाषणों के जरिये मोदी सरकार की पोल खोलना और उसकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक अक्षमताओं और बदमाशियों पर टिप्पणी करना ही रहा।

धरनों से जो सकारात्मक उर्जा और मौका मिला था, उसे भुनाने में लोकतांत्रिक समाज का सपना देखने वाला धड़ा लगभग नाकामयाब हुआ है। यही वजह है कि अब हालात यह हैं कि दो महीने में खुद सत्याग्रहों, शाहीन बागों और धरनों तक में अलोकतांत्रिक पद्धतियां पैर पसारने लगी हैं। उपर से हिंसक दमन का खतरा है ही। अभी तक सीएए विरोध का पूरा वातावरण दो बातों से भरा पड़ा है—

पहली, लोग एक दूसरे के बारे में, व्यक्तियों के बारे में बातें कर रहे हैं। जैसे चंद्रशेखर आजाद ने यह कहा, कन्हैया कुमार ने यह कहा, मोदी—शाह—योगी की जमात ने यह बयान दिया, स्वरा भास्कर के बारे में फंला व्यक्ति ने यह बोला। या फिर उससे भी नीचे आए तो आंदोलन के जमीनी साथियों ने एक दूसरे पर टिप्पणियां की कि फंलाने शख्स ने आज ऐसा किया, यह गलत किया वह सही किया। इनमें चंद लड़ाइयां, तकरारें और उन्हें संभालने की कोशिशों में भी बहुत सारी उर्जा बर्बाद हुई।

दूसरा काम हुआ, खबरों का। पूरे देश में व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब पर सवार खबरों का ऐसा संजाल था कि एक पूरा घटाटोप बन गया। हर रोज किसी भी सक्रिय सीएए विरोधी कार्यकर्ता के मोबाइल पर, मेल पर सोशल मीडिया एप के जरिये हजारों की तादाद में खबरें ​आईं। इन खबरों में ज्यादातर विरोध की बातें और सरकार की नई कुटिल चालों या फिर कमजोरियों का विश्लेषण था।

इस दौरान आंदोलन के विभिन्न चरणों को व्यापक बनाने और इसके विभिन्न मोर्चों को साफ नजरों से देखकर उनकी खामियों—खूबियों का विश्लेषण की ईमानदार कोशिशें बेहद कम हुई हैं। इसी वजह से यह पूरा आंदोलन एक ऐसे सवाल से रूबरू है जिसका कोई एक सीधा साफ जवाब नहीं है। वह सवाल है कि हिंसक दमन और सरकारी अख्ख्ड़ता के बाद अब क्या?

इस बीच एक काम और हुआ। विभिन्न शाहीन बागों से कुछ अच्छे वक्ता निकले जो अपने आसपास के क्षेत्रों से भी जुड़े और कुछ राष्ट्रीय फलक या राज्य स्तर पर अलग अलग धरने प्रदर्शन में पहुंचे। इससे शहरों—कस्बों के बीच एक व्यापक साझेदारी बनी और इससे आंदोलन मजबूत हुआ। लेकिन फिर भी इसकी कोई व्यवस्थित कोशिश बहुत परवान नहीं चढ़ सकी है। इसकी अपनी मुश्किलें हैं। जैसे मध्य प्रदेश में ही 6 जनवरी को भोपाल के सत्याग्रह में राज्य के सभी धरनों को एकजुट करने की कोशिश शुरू हुई और फिर 12 जनवरी को गांधी भवन और 21 जनवरी को इकबाल मैदान में बैठकों के बाद 30 जनवरी को एक बड़ा मोबलाइजेशन किया गया। लेकिन पूरे प्रदेश के धरनों को जोड़ने की प्रक्रिया तब भी पूरी नहीं हो पाई है। इसके पीछे नेतृत्वकारी समूहों का व्यक्तिवादी रवैया तो एक बड़ी वजह है ही, स्पष्ट विजन का अभाव भी साफ दिखता है।

बहरहाल, ऐसे हालात में जरूरी हो जाता है कि अपने भीतर झांकते हुए रणनीतिक बदलाव किए जाएं। मौजूदा सरकार जिस किस्म का रुख अपनाए हुए है, उससे साफ लगता है कि वह 1 अप्रैल से एनपीआर की प्रक्रिया शुरू करेगी। सीएए विरोधी पक्ष ने इसके लिए फिलहाल नुक्कड़ सभाओं और बस्तियों में पहुंचकर एनपीआर का शांतिपूर्ण विरोध यानी सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाने की बात कही है, लेकिन यह कितनी कारगर होगी, कहना मुश्किल है। जाहिर तौर पर एक मोहल्ले के चंद लोगों ने भी एनपीआर करवाया तो सरकार का काम पूरा हो जाएगा। पुलिस प्रशासन और यहां तक की दबंगई के जरिये भी सरकार यह कराने से गुरेज करती नहीं दिख रही हैं।

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि विभिन्न धरनों, शाहीन बागों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। इसके लिए सबसे पहले तो ठोस और व्यवस्थित अखिल भारतीय कोआर्डिनेशन की जरूरत होगी, जो एक बड़ी जिम्मेदारी का काम है। आज देश में करीब 2000 से ज्यादा शहरों में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इनमें 150 से ज्यादा भाषाओं में मोदी—शाह के खिलाफ नारे लगाए जा रहे हैं। इन सभी शाहीन बागों की सोच, समझ और सरोकार में भी फर्क है। कुछ जहां सिर्फ सीएए के विरोध के लिए एकजुट हैं, तो कई जगह इसके साथ रोटी, रोजगार से जुड़े सवाल भी हवा में हैं। यह देश की विविधता का एक बड़ा रूपक है। ऐसे में इन्हें एक मंच पर लाना मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं। राज्य या फिर संभाग स्तर के कोआर्डिनेशन से इसकी शुरूआत हो सकती है।

दूसरा अहम काम है कि दिल्ली में सीधे जाकर सीएए विरोध की ताकत की आजमाइश की जाए। इसके लिए 1 अप्रैल की तारीख अहम हो सकती है। या उसके बाद भी। क्योंकि लंबे समय तक एक ही जगह धरना देने से लोगों की ताकत टूटने लगती है। प्रशासन सुन नहीं रहा है, और स्थानीय प्रशासन के पास ज्ञापन लेने से अधिक कोई हैसियत भी नहीं है। यह पूरा खेल दिल्ली में रचा गया है, तो दिल्ली पर दबाव डालना जरूरी है। जैसे हर शहर में जो लोग जुट रहे हैं, उन्हें अब शहरों से निकलकर दिल्ली भी पहुंचना होगा। अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, करी​बियों के पास पहुंचे। सड़कों पर निकलें। प्रतिरोध की संस्कृति के लिए यह जरूरी कदम है।

इसके पहले दिल्ली के सभी शाहीन बागों को भी हिंसा के बाद अपनी बिखरी हुई ताकत को बटोरकर पुन: एकजुट होना होगा। क्योंकि आखिर दिल्ली से ही पूरे देश को ताकत मिल रही है और सरकारी दमन की जड़ भी फिलवक्त वहीं है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सीएए विरोध की बौद्धिक और नेतृत्वकारी ताकतें इन सवालों पर गंभीरता से विचार करेंगी और प्रतिरोध की संस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका को स्पष्ट करेंगी।

और अंत में…
आंदोलनों में मुश्किलें आती ही हैं। सवाल भी आते हैं। आंदोलनों के विरोधी कीचड़ भी उछालते हैं और इन्हें तोड़ने की कई स्तरों पर कोशिशें भी करते हैं। सवाल यह है कि इसके लिए आंदोलनकारी कितना जनशिक्षण कर पाते हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि सीएए विरोधी आंदोलन के साथियों के बीच ही लोकतंत्रिक पद्धतियों की अवहेलना की जा रही है। कट्टरता और लोकतांत्रिक समूहों के बीच सीएए विरोध में भी खासी कश्मकश है। जरूरी यह भी है कि अपने बीच की कट्टरता को भी ढांकने के बजाय उसका इलाज किया जाए। वरना मौजूदा लड़ाई भले ही जीत जाएं, लेकिन आगे जाकर नए सिरे से कट्टरता अपना फन खोल लेगी।