विकास त्रिवेदी

दिल्ली दंगों पर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ”हिंसा की अंतिम सूचना 25 फरवरी को रात 11 बजे मिली थी. 36 घंटे में दंगे समाप्त हो गए.”

जितने स्थानीय लोग और पत्रकार हिंसा प्रभावित इलाके में थे, वो ईमानदारी से बता सकते हैं कि ये साफ़ झूठ है.

26 फरवरी की रात 11-12 के करीब हमें ख़ुद खून से सना लड़का दयालपुर पुलिस थाने के पास मिला था. सिर पर गहरी चोट थी. मैं खुद दयालपुर थाने के बाहर खड़े पुलिसवाले के पास सूचना देने और मदद मांगने गया तो उसने साफ़ इंकार कर दिया.

इसी जगह से थोड़ा दूर डंडे लिए खड़े लड़कों को हमसे ‘सख्ती से बात’ करता देख पुलिस की गाड़ी फुर्र से निकल ली थी. दंगा 36 घंटे से कहीं ज़्यादा चला था. दंगा उतना भर नहीं होता, जिसमें हाथ में पेट्रोल बम लिए लोग घर जलाते, लोगों को मारते आगे बढ़ते हैं.

दंगा वो भी है, जहां 28, 29 फरवरी को इसी उत्तर पूर्वी दिल्ली में माइक से अनाउंस (रिकॉर्डेड) किया जाता है- जब दुश्मन आएंगे तो जवान लड़के बाहर निकलें और दुश्मनों को सबक सिखाएं.

जहां 50 से ज़्यादा लोग धर्म के नाम पर मारे गए, वहां धर्म का हिसाब रखना ज़रूरी होता है. क्योंकि इसी धर्म के नाम पर अंकित शर्मा का भी जिस्म गोदा गया और उस लड़के का भी जिसे सड़क पर लेटाकर जन-गण-मन सुनते हुए पुलिस खून निकाल रही थी. ये वही पुलिस थी, जिसने पेट्रोल पंप के सीसीटीवी कैमरे तोड़ दिए.

दिल्ली पुलिस, क्या सोचा था… सरदार बहुत खुश होगा? शाबाशी देगा?
सही सोचा था. सैकड़ों घर जले, लोग मारे गए, बेघर हुए और सरदार ने शाबाशी ही दी.

धर्म के नाम पर शुरू हुए दंगों में मृतकों और हिंसा से प्रभावित लोगों का धर्म बताने की बजाय ‘भारतीय’ कहना अपने आप में मज़ाक जान पड़ता है. दंगे में मारे गए लोग उस रोज़ भारतीय कहां रह गए थे. वो या तो रतनलाल नाम वाले हिंदू रह गए थे या अशफाक नाम वाले मुसलमान.

अगर मारे गए लोग भारतीय हैं तो फिर वो लोग भी भारतीय ही थे, जो एक गलत फैसला करने के बाद जाफराबाद मेट्रो स्टेशन आकर बैठ गए थे. इन भारतीयों को भी संविधान से मिले अधिकार की तरह भारतीय क्यों नहीं ट्रीट किया गया? मुसलमान जीते जी पाकिस्तानी कहलाता है और मरकर भारतीय.

ये भी सही है कि 14 दिसंबर से लेकर वारिस पठान तक दिए बयानों को गंभीरता से रीड किया जाए तो ये भड़काऊ लग सकते हैं. लेकिन जैसा कि एक महान दार्शनिक ने कहा था कि आप क्रोनोलॉजी समझिए.

14 दिसंबर के पहले से लेकर 21 फरवरी तक कई भाषण हुए. शाहीन बाग करंट पहुंचाने से लेकर केंद्रीय मंत्रियों के गोली मारने को कहने तक. लेकिन ये भाषण ऐसे लोगों ने दिए, जो हिंसा की जगह से बहुत दूर थे. यकीनन बयानों वाली मुंडियों का घटनास्थल पर मौजूद रहना ज़रूरी नहीं है. लेकिन जब क्रोनोलॉजी समझी ही जा रही है तो बीजेपी उम्मीदवार कपिल मिश्रा के घटनास्थल वाली जगह पर दिए अल्टीमेटम को कैसे भूला जा सकता है. ट्विटर पर अति सक्रिय कपिल मिश्रा की भूमिका अब जांच का विषय से कहीं ऊपर हो गई है. जैसा कि खुद अमित शाह ने कहा , ”सोशल मीडिया के ज़माने में हेट स्पीच वायरल होना काम कर जाती है.”

”दिल्ली पुलिस ने दंगे को दिल्ली के चार फीसदी क्षेत्र तक सीमित रखा.” कितना अच्छा होता इसके साथ आप ये भी बताते कि इस क्षेत्र में औसत जनसंख्या घनत्व कई गुणा ज़्यादा है. मुंबई से दोगुना. यानी क्षेत्र भले ही कम है लेकिन लोग बेहद चिपककर रहते हैं. इतना चिपककर कि ज़रा सी चिंगारी लगाओ तो हिंदू हो या मुसलमान दोनों से लपटे उठने लगती हैं.

अमित शाह की विनती सुनकर अजीत डोभाल ने जिन इलाकों का दौरा किया, उसी इलाके से उसी शाम की कहानी सुनिए. इरफान घर से बच्चों के लिए दूध लेने ये कहकर निकले कि डोभाल ने दौरा किया है, सब सही है.

कुछ देर बाद इरफान की तलवार से कटी लाश घर पहुंची. डोभाल के दौरे का असर किन्ही मशहूर एंकर्स को भले ही दिख गया हो, अब्बा के दूध लाने का इंतज़ार कर रहे इरफान के बच्चों को आज तक नहीं दिखा.

अमित शाह ने कहा कि दिल्ली में दंगा फैलाने वालों का ऐसा अंजाम होगा कि लोग सबक लेंगे. काश ये सच हो. लेकिन ये ‘काश’ लिखते ही मुझे 1984 दंगा में इंसाफ़ को तरसते सिख परिवार भी याद आने लगे और गोधरा में जलाए गए कारसेवक, गुलबर्ग सोसाइटी में जलाए मुस्लिम परिवार भी याद आ गए.

हम सब…सब लेते हैं बस सबक ही नहीं लेते हैं. अगर लिया होता तो कोई नेता हम लोगों में से ही कुछ को दंगाई ना बना पाते. वो दंगाई जो CAA विरोधी रैली से भी निकलकर पुलिस पर हमला करने लगे और वो CAA समर्थक भी जो मेरे राम का नाम लेकर दंगाई बन गए. पौधों को लगाए जाने की गुंजाइशों वाले देश में हम सब बड़े पेड़ों का गिरना, कटना और फिर धरती के हिलने का इंतज़ार करते रहे.

धरती तो तब भी हिलती है, जब धर्म की वजह से खून में लथपथ कोई आम ‘भारतीय’ आख़िरी सांस लेते हुए धरती पर गिरता है. कभी जय श्री राम सुनते हुए, कभी नारा-ए-तकदीर सुनते हुए… तो कभी जन-गण-मन गाते हुए.

धरती तब भी हिलती है हे भारत भाग्य विधाता…

(विकास त्रिवेदी की फेसबुक वॉल से साभार)

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