नई दिल्ली। पिछले दिनों CAA पर केंद्र सरकार की ओर से एक प्रश्नोत्तरी जारी की गई। इस प्रश्नोत्तरी में जितना बताया गया उससे कहीं अधिक छुपाया गया है। इसे हमारी पिछली पोस्ट CAA पर बात करते हुए आखिर क्या छुपा रही है केंद्र सरकार? में देखा जा सकता है। सरकार सवालों के जवाब देते हुए अपनी ओर से सवाल तो चुन लेती है, लेकिन वे जरूरी सवाल छोड़ देती है, जिनके जवाब आज पूरा देश मांग रहा है। यहां जानते हैं उन 8 अहम सवालों को जिनसे सरकार बच रही है और जिनके जवाब पूरे देश की जनता मांग रही है।

पहला सवाल: इस सूची में केवल तीन देशों– पाकिस्‍तान, अफ़ग़ानिस्‍तान और बांग्‍लादेश – के प्रताड़ित धार्मिक समूहों को ही क्‍यों शामिल किया गया है। अन्‍य पड़ोसी देशों, जैसे श्रीलंका (सभी धर्मों के तमिल), म्‍यांमार (रोहिंग्‍या) और चीन (ख़ासकर बौद्धधर्म को माननेवाले तिब्‍बती और उइगर) के धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों को क्‍यों शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण विभाजन को नहीं बताया जा सकता क्‍योंकि अफ़ग़ानिस्‍तान का विभाजन से कुछ भी लेना-देना नहीं था। हालाँकि सीएए में जिन समुदायों का ज़िक्र किया गया है, उनकी प्रताड़ना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि ‍क्‍यों केवल कुछ ख़ास देशों के ख़ास समुदाय ही इसमें शामिल किये गये हैं।

दूसरा सवाल: जब अफ़ग़ानिस्‍तान, पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश के प्रताड़ित धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों को सुरक्षा देने की कोशिश की ही जा रही है तो फिर उन्‍हीं देशों के बलूच, अहमदिया और शिया जैसे अन्‍य प्रताड़ित धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों को वैसी ही सुरक्षा क्‍यों नहीं मुहैया करायी जा रही है। उनकी प्रताड़ना के भी पर्याप्‍त प्रमाण मौजूद हैं। केवल एक उदाहरण दें तो पाकिस्‍तान में अहमदिया समुदाय को 1974 में ग़ैर-मुस्लिम अल्‍पसंख्‍यक घोषित कर दिया गया था और अहमदिया लोग हालाँकि ख़ुद को मुस्लिम ही मानते थे, इसके बावजूद 1984 में क़ानून पारित कर उनके लिए ख़ुद को मुस्लिम कहना, इस्‍लाम को अपना धर्म बताना, या सार्वजनिक तौर पर इस्‍लाम धर्म का पालन करना दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया। पाकिस्‍तान में अहमदिया लोगों पर लगातार हमले होते रहे हैं और उनकी हत्‍या की जाती रही है। ज़ाहिरा तौर पर वे एक प्रताड़ित समूह ही हैं। एक दूसरा उदाहरण लेते हैं, पिछले कई दशकों से चकमा जनजाति के लोग उत्‍पीड़न और अन्‍य कारणों के चलते बंगलादेश से उत्‍तर-पूर्वी राज्‍यों में हज़ारों की संख्‍या में आकर बस गये हैं। उनमें से कइयों को नागरिकता मिल चुकी है पर कई ऐसे हैं जिन्‍हें नागरिकता नहीं दी गयी है और वे नागरिकता की माँग कर रहे हैं। उनकी एक भारी तादाद बौद्ध धर्म को माननेवाली है, इसलिए वे सीएए के तहत नागरिकता के हक़दार हैं। लेकिन उनका एक हिस्‍सा ऐसा भी है जो इस्‍लाम को मानता है। तो क्‍या आप ग़ैरमुस्लिम चकमाओं को नागरिकता देंगे और मुस्लिम चकमाओं को नहीं, जबकि देखा जाये तो उनकी स्थिति एक जैसी ही है।

तीसरा सवाल: 1951 के रिफ़्यूजी कन्वेन्शन और 1967 के प्रोटोकॉल के तहत, उन लोगों को शरणार्थी का दर्ज़ा दिया जाना चाहिए, जो जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्‍यता या विशेष राजनीतिक मत के कारण उत्‍पड़ित होते हैं। इन दोनों में भारत हालाँकि किसी का भी सदस्‍य नहीं है, फिर भी, यदि उत्‍पीड़न ही शरणार्थियों को नागरिकता देने का पैमाना है तो क्‍यों केवल ग़ैर-मुस्लिम धार्मिक समूहों को उत्‍पड़ित मानकर उन्‍हें ही ये सारी सुविधाएँ दी जा रही हैं, उन्‍हें क्‍यों नहीं, जो अन्‍य वजहों से उत्‍पड़ित किये जा रहे हैं? उदाहरणस्‍वरूप 19 दिसम्‍बर, 2019 को एक पाकिस्‍तानी शिक्षाविद् ज़ुनैद हाफ़ीज़ को ईश निन्‍दा के लिए मौत की सज़ा दी गयी थी। यह साफ़ तौर पर बोलने की आज़ादी के लिए होनेवाली प्रताड़ना थी। पड़ोसी मुल्‍कों में इस तरह या किसी अन्‍य तरीके से लोगों की एक बहुत बड़ी आबादी राजनीतिक रूप से उत्‍पड़ित की जा रही है। अगर भारत प्रताड़ि‍तों की मदद करना ही चाहता है तो भारतीय नागरिकता उन्‍हें क्‍यों नहीं दी जा रही है जिनको धर्म के अलावा अन्‍य आधारों पर प्रताड़ि‍त किया जा रहा है?

चौथा सवाल: कुछ लोगों को उनके धर्म के आधार पर नागरिकता क्‍यों प्रदान की जा रही है। यह खुले तौर पर धर्मनिरपेक्षता के ख़ि‍लाफ़ है, जो न सिर्फ़ संविधान की प्रस्‍तावना का हिस्‍सा है बल्कि जिसे सर्वोच्‍च अदालत द्वारा संविधान की मूल सरंचना का अंग माना गया है। भारत का संविधान वह पहला दस्‍तावेज़ है जो नागरिकता निर्धारित करता है और देता है। ज़ाहिर है यह विभाजन और उससे मिले सारे जख्‍़मों के फ़ौरन बाद ही अमल में आया। इसके बावजूद, इसने पाकिस्‍तान (पूर्व और पश्चिम दोनों) के प्रवासियों को नागरिकता हासिल करने की इजाज़त दी और कभी धर्म के आधार पर उनके बीच भेदभाव नहीं किया। असम समझौते में नागरिकता निर्धारण के लिए असम में प्रवेश की अन्तिम तिथि (कट-ऑफ़ डेट) 25 मार्च, 1971 रखी गयी थी लेकिन धार्मिक आधार पर उसमें कोई भेदभाव नहीं किया गया था। आप्रवासी (असम से निष्‍कासन) क़ानून,1950 भी धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। इसलिए अब धार्मिक कोण शामिल करने का कोई औचित्‍य नहीं है। अगर पड़ोसी देशों के प्रताड़ित व्‍यक्तियों को सुरक्षा देनी ही थी तो यह सुरक्षा सभी प्रताड़ित व्‍यक्तियों को मिलनी चाहिए थी।

पांचवां सवाल: सीएए के तहत नागरिकता क्‍यों केवल उन्‍हीं लोगों की दी जा रही है जो 31.12.2014 से पहले भारत आये हैं? क्‍या इन देशों में 31.12.2014 के बाद से प्रताड़ना बन्‍द हो गयी है?

छठा सवाल: एनआरसी में वित्‍तीय और मानव संसाधन पर होनेवाला ख़र्च क्‍या होगा और भारत यह जोखिम क्‍या उठा भी पायेगा। असम में लगभग 100* लोग अपनी जान गँवा चुके हैं और उनकी मौत नागरिकता से जुड़े मामलों से सम्‍बन्धित है। जहाँ कुछ लोगों ने राष्‍ट्रीय नागरिक रजिस्‍टर (एनआरसी) के चलते हताशा, चिन्‍ता और लाचारी में आत्‍महत्‍या कर ली है, वहीं कुछ ने डिटेंशन शिविरों में क़ैद किये जाने के डर से जान दे दी है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी डिटेंशन शिविरों में रहस्‍यमयी परिस्थितियों में मौत हुई है। असम एनआरसी की लागत 1,600 करोड़ रुपये थी और 3.3 करोड़ लोगों का नाम दर्ज करने के लिए 50,000 कर्मचारी तैनात किये गये थे। अब हम इस बात को जानते हैं कि रजिस्‍टर जब पूरा हुआ तो 19 लाख लोग, जिनमें सभी धर्मों से जुड़े ज्‍़यादातर लोग वास्‍तव में नागरिक थे, उस रजिस्‍टर से बाहर हो गये थे। यदि हम केवल 87.9 करोड़ भारतीय मतदाताओें की गिनती करें और इसे मोटे तौर पर हुई गणना मानें तो पूरे भारत के लिए एनआरसी का ख़र्च 4.26 लाख करोड़ रुपये आयेगा और इसे अंजाम देने के लिए 1.33 करोड़ कर्मचारियों की ज़रूरत पड़ेगी। इसके साथ ही डिटेंशन शिविरों का निर्माण करने की ज़रूरत पड़ेगी यह ख़र्च लोगों पर पड़नेवाले भारी भरकम ख़र्च के अलावा है। अगर असम में देखा जाये तो एक बड़ी संख्‍या में लोग अपनी ज़मीन बेचने पर मजबूर हुए हैं और उच्‍च न्‍यायालय व फ़ॉरेनर्स ट्रिब्‍युनल्‍स में अपने मुक़दमे की पैरवी करने के लिए वकीलों को पैसा चुकाने में ख़स्‍ताहाल हुए जा रहे हैं।

(*सिटिजन्‍स फ़ॉर जस्टिस एण्‍ड पीस संस्‍था द्वारा असम में की गयी मृत्‍यु-सम्‍बन्‍धी गणना से यह पता चलता है कि 28 मौतें डिटेंशन शिविरों में हुईं और बाक़ी मौतें घरों में आत्‍महत्‍या से, दिल के दौरे से या गम्‍भीर चोट लगने से हुईं।)

सातवाँ सवाल: क्‍या एनआरसी की कोई ज़रूरत है भी? एनआरसी देश के नागरिकों का एक रजिस्‍टर है। भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 326 और जन प्रतिनिधित्‍व क़ानून, 1950 के तहत केवल नागरिकों को ही मताधिकार प्राप्‍त है। इसलिए वे सभी लोग जो मतदाता सूची में हैं, उन्‍हें ज़ाहिर है कि नागरिक माना गया है। पूरे भारत के मतदाता सूचीपत्रों को इकट्ठा करने पर आपको स्‍वत: ही 18 वर्ष के ऊपर के सभी लोगों का सम्‍पूर्ण नागरिकता रजिस्‍टर मिल जायेगा। तो फिर ये सारी चीज़े क्‍यों दोहरायी जायें? 18 से कम उम्र के लोग इतने बड़े नहीं होते हैं कि वे अपने दम पर किसी दूसरे देश से भारत में आ सकें। इसलिए, उनके माता-पिता यदि मतदाता सूची में शामिल हैं तो बच्‍चे स्‍वत: ही (कुछ अपवादों को छोड़कर) नागरिक बन जायेंगे। तब हर एक के लिए अपने नागरिक होने का फिर से सबूत देना आवश्‍यक बना देने का (असली) मक़सद क्‍या हो सकता है। इसके पीछे तो यही मंशा काम कर सकती है कि सभी समुदायों (ख़ासकर दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और ट्रांसजेण्‍डर लोगों) के ग़रीबों की एक भारी आबादी और मुसलमानों के एक बड़े हिस्‍से को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया जाये। एनआरसी के बिना भी विदेशियों सम्‍बन्‍धी अधिनियम, 1946 के तहत सरकार को अवैध आप्रवा‍सियों को बाहर निकालने का अधिकार प्राप्‍त है। दशकों से उन लोगों को “हटाने” के लिए, जिन्‍हें विदशियों के रूप में देखा जाता है, नियमित मुक़दमे चलाये जाते हैं। एनआरसी की यह पूरी क़वायद और कुछ नहीं बस ख़ौफ़ पैदा करना और ऐसे लोगों का एक विशाल समूह बनाना है, जो मतदाता नहीं होंगे, जिनके लिए कल्‍याणकारी योजनाएँ नहीं होंगी और जिन्‍हें अलग-अलग “डिटेंशन शिविरों” में सम्‍भवत: दास श्रम के रूप में इस्‍तेमाल किया जायेगा, यहाँ तक कि अगर वे आज़ाद भी हो जायें तो बिना किसी अधिकार के एक ऐसी आबादी में शामिल होंगे जो मज़दूर के रूप में बेहद सस्‍ते दरों पर उद्योगपतियों और उनके दलालों को उपलब्‍ध होते रहेंगे।

आठवाँ सवाल: यदि प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि एनआरसी प्रक्रिया शुरू करने की कोई योजना नहीं है तो जनसंख्‍या रजिस्‍टर (एनपीआर) की क़वायद क्‍यों की जा रही है। 31 जुलाई, 2019 को केन्‍द्र सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी की गयी थी कि 1 अप्रैल, 2020 से 30 सितम्‍बर, 2020 के बीच देरभर में एनपीआर की प्रक्रिया चलायी जायेगी। जनगणना और जनसंख्‍या रजिस्‍टर के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी है। लेकिन जनसंख्‍या रजिस्‍टर एनआरसी के नियम 4 का हिस्‍सा है जबकि जनगणना जनगणना अधिनियम के अधीन है जो पूरी तरह से एक स्‍वतंत्र अधिनियम है और जिसका उद्देश्‍य बिल्‍कुल अलग है। इसलिए जब जनसंख्‍या रजिस्‍टर तैयार किया जा रहा है तो यह एनआरसी की दिशा में पहला क़दम है। “जनसंख्‍या रजिस्‍टर” का इसके सिवाय कोई अन्‍य उद्देश्‍य नहीं है कि वह पूरे भारत में एनआरसी के काम को आगे बढ़ाये।

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