यह अंत की शुरुआत है, क्योंकि मनुष्य महज एक आंकड़ा नहीं है

सचिन श्रीवास्तव

भोपाल। करोंद इलाके के 32 वर्षीय अनिल अहिरवार की आत्महत्या उस व्यवस्था के लिए एक आखिरी संदेश है, जो अपनी हर नाकामी को ढंकने के लिए तमाम आंकड़े पेश करने में महारत हासिल कर चुकी है। जिसके लिए मौतें महज एक आंकड़ा है, जैसे गरीबी एक आंकड़ा है, जैसे दी जाने वाली राहत एक आंकड़ा है।

अनिल करीब तीन हफ्तों से सब्जी बेचने नहीं जा पा रहे थे। उन्होंने गुरुवार दोपहर सीलिंग फैन से फंदा बांधकर अपनी सारी जिम्मेदारियों को मौत के हवाले कर दिया। ये सवाल सरकार से सवाल पूछने का कतई नहीं है। क्योंकि सरकार से जवाब की उम्मीद ही बेमानी है। इससे पहले विभिन्न सरकारों ने ऐसी बहुत सी मौतें देखी हैं, और आगे भी ऐसी मौतों के लिए वह तैयार है। घड़ियाली आंसू, दिखावे की जांच और आश्वासनों की लंबी खेप फिर तैयार हो जाएगी।

सवाल आप हम खुद से पूछें। क्या अनिल ने इस लॉकडाउन के दौरान अपने परिवार के लिए खाने के प्रबंध की कोई कोशिश नहीं की होगी? क्या आखिरी वक्त में फांसी के फंदे से झूलने के पहले उनके जेहन में अपनी मासूम बच्चियों काव्या और साक्षी का चेहरा नहीं आया होगा? क्या उनकी हर उम्मीद खत्म हो गई थी? क्या उन्होंने नहीं सोचा होगा कि उनके जाने के बाद उनकी पत्नी नमिता का क्या होगा, वह कैसे अपनी बच्चियों को पाल पाएगी? क्या उन्हें अपने करीबियों, अपने पडोसियों, अपने मोहल्लेवाले, समाज, सरकार से अब कोई उम्मीद शेष नहीं रह गई थी? क्या वे जानते थे कि अगर आज वे खुद को खत्म नहीं करेंगे तो उनके सामने उनके परिवार को मरता हुआ देखेंगे? ऐसे कई सवाल अपने आप से हमें पूछने चाहिए।

साथ ही यह भी समझना चाहिए कि अनिल ने अचानक आत्महत्या का फैसला नहीं किया है। जैसे सरकार ने ​अचानक लॉकडाउन किया था। अनिल ने 21 दिन इंतजार किया। उन्हें उम्मीद थी कि 14 अप्रैल के बाद जिंदगी पटरी पर आएगी। बीमारी को वे हरा ​देते, लेकिन भूख से हार गए। उन्हें लगा होगा कि अब अपनी आंखों के सामने बच्चों को भूख से हलकान होते देखने से अच्छा है कि सब कुछ खत्म कर दिया जाए।

वे हमारे से सामने जो सवालों की फेहरिस्त छोड़कर गए हैं, उसमें यह भी शामिल है कि कि अगला नंबर हमारे आसपास के किस अनिल का है? अब कौन होगा जो इस तरह अपनी जिंदगी खत्म करेगा। क्योंकि कामकाज तो बहुतौ के ठप हैं, राशन तो बहुत से घरों में नहीं है। बच्चों की भूख से बेजार तो कई परिवार हैं।

अनिल की मौत को जो लोग महज आत्महत्या बता रहे हैं वे उतने ही झूठे हैं, जो यह दावा कर रहे हैं कि सरकार की ओर से हर जरूरतमंद की मदद की जा रही है। जाहिर है कि यह मदद राजधानी भोपाल के करौंद इलाके तक नहीं पहुंची है। आखिर कविता की वे पंक्तियां सच साबित हुईं हैं एक बार फिर कि— हत्याएं और आत्महत्याएं एक जैसी रख दी गई हैं, फर्क कर लेना साथी।

सरकारी विज्ञप्ति में कहा जाएगा कि भोपाल की करोंद स्थित विधवा कॉलोनी में एक युवक ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। युवक सब्जी का ठेला लगाता था, लेकिन लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए उसने अपनी मर्जी से अपना कामकाज बंद कर दिया था। वह देश की बड़ी लड़ाई में पूरी मुस्तैदी से खुद को घर में बंद किए हुए था। अपनी दो नन्हीं बेटियों के साथ बेहद खुश था। कहीं विज्ञप्ति में यह भी जिक्र आ जाएगा कि उसने कुछ कर्ज ले रखा था। सरकार ये भी बताएगी कि चूंकि उसके घर में कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है, इसलिए कहना मुश्किल है कि उसने लॉकडाउन के चलते आत्महत्या की है। हालांकि तफ्तीश जारी रहेगी।

सूचना है कि अनिल के खराब आर्थिक हालात और राशन खत्म होने की जानकारी पडोसियों को भी थी। उन्हें उम्मीद थी कि 14 अप्रैल के बाद कामकाज शुरू हो जाएगा और अन्न के दाने घर लाने का जुगाड़ कर पाएंगे। लेकिन लॉकडाउन बढ़ने से रही सही उम्मीद भी खत्म हो गई।

सरकार के लिए यह एक मौत है। हमारे आपके लिए चेतावनी और एक आंकड़ा, लेकिन यह बात भी उतनी ही साफ है कि मनुष्य महज एक आंकड़ा भर नहीं है। जब जब कोई मरता है, तो उसके पीछे वजहों और दोषियों की लंबी लिस्ट होती है, जिसे हम कभी जानबूझकर छुपाते हैं, तो कभी वह दिखाई ही नहीं देती।

उम्मीद करें कि इस बार ऐसा नहीं होगा… क्योंकि इस उम्मीद के अलावा विकल्प नहीं है फिलहाल। सरकार से कोई उम्मीद बेमानी है।