एक तरफ कुआं, तो दूसरी तरफ खाई के बीच में है देश

अब्दुल हक

पूरी दुनिया में अभी जिस किस्म के हालात हैं, वो किसी तरीके से काबू नहीं हो पा रहे हैं। पूरी दुनिया में कोरोना केस 1,236,842 और मौत की संख्या 67,253 पर पहुंच चुकी है। ये बात सकारात्मक है कि जिन लोगों को बचाया जा सका उनकी तादाद मरने वालों से ज्यादा है, यानी 255,619। जो लोग अभी भी कोरोना से लड़ रहे हैं, उनकी तादात 913,970। या शायद आप जब ये पंक्तियां पढ़ रहे हों तो ये आंकड़े और भी बढ़ चुके हों। (कोरोना संबंधी ताजा आंकड़ों के लिए यहां क्लिक करें।)

बहरहाल, अकेले अमेरिका का अनुमान है कि इस महामारी से लड़ते लड़ते 2 लाख अमेरिकी मारे जा सकते हैं। चीन, इटली, फ़्रांस, ईरान, ब्रिटेन, स्पेन, स्विट्ज़रलैंड, मलेशिया जैसे मजबूत देश इससे पहले ही बुरी तरह प्रभावित हैं। वहीं हम भारतीय अपने देश के अंदरूनी हालात के बारे अच्छी तरह जानते हैं कि देश की स्थिति कागज पर बहुत अच्छी बनाकर दिखाई जाती है। यहाँ के हालात ऐसे हैं कि एक तरफ कुआं है एक तरफ खाई और बीच में देश खड़ा है। ये अच्छी बात है अभी हम बीच में खड़े हैं या तो हम कुआं पूर कर या खाई पूर कर आगे निकल जाएं। या अपनी हटधर्मिता और अंधविश्वास में कूद जाएं।

इस वक़्त सरकार को विपक्ष को और सिविल सोसाइटी को संयम और समझदारी बरतने की जरूरत है। इस समय अगर सरकार ने सबक नहीं लिया तो खुद मरेगी और हम सबको मारेगी। इस वक़्त सरकार के अकेले के बस में यह बिलकुल भी नहीं हैं कि वह इन हालात में अकेले अपने दम पर मुकाबला कर पाए। ना ही विपक्ष के हाथ में कुछ है, और ना ही सिविल सोसाइटी अपने दम पर कुछ कर सकती है। तीनों ताकतों को एक होकर इस लड़ाई में कूदना पड़ेगा।

केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अपना घमंड छोड़कर साथ मिलकर चले और विपक्ष के साथ समन्वय बनाए। साथ ही सिविल सोसाइटी के साथ समन्वय बनाकर एक प्रोग्राम बनाए जिससे देश के अंदर मौजूदा हालात में हम लड़कर इस महामारी से छुटकारा पा सकें। एक दूसरे के ऊपर इलज़ाम रखने से कुछ हासिल नहीं होगा।

संसदीय क्षेत्र में विपक्ष के पास अभी भी समझदार लोग हैं और सिविल सोसाइटी के पास ज़मीनी स्तर पर काम करने का सकारात्मक अनुभव है। इसलिए साथ मिलकर लड़ाई लड़ें। एक तरफ देश पहले ही बहुत सारी बीमारियों से घिरा हुआ है और दूसरा भूख भी देश की सबसे बड़ी बीमारी है। अब इस जगह ये बताने की बिल्कुल जरूरत नहीं है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं कैसी हैं। ना ही ये किसी से छिपा हुआ है कि हमारे आर्थिक हालात कैसे हैं। सब जानते हैं कि हम पहले से ही मंदी के दौर से गुज़र रहे हैं।

अब फ़ैसला सरकार को करना है कि वो दिन भर हिन्दू मुस्लिम करने के लिए मीडिया को छोड़ दे जिससे आमजन इस भयावह हालात को समझ नहीं पाए, या सकारात्मक सोच के साथ मिलकर काम करे। भोपाल के जनसंपर्क समूह ने कोशिश की है कि सरकार के साथ मिलकर काम करे मगर अभी सरकार की तरफ से कोई सकरात्मक जवाब नहीं आया है।