दान दया करने लोग आते हैं, लेकिन रोज डर रहता है कि आज कुछ नसीब होगा या नहीं?

लॉक डाउन में बेबस गाड़िया लोहार

लॉकडाउन में सरकार ने सभी को घर जाने की हिदायत दे दी थी। यह मानकर ही देश की पूरी आबादी घरों में रहती है। लेकिन इसी देश में घुमक्कड़ अर्ध घुमक्कड़ जातियां भी रहती हैं, यह शायद सरकार भूल गई। होशंगाबाद के 13 लोग भी इसी देश के नागरिक हैं, लेकिन इत्तेफाक देखिये कि इन 13 की समस्याएं ठीक वहीं हैं, जो 130 करोड़ लोगों की हैं।
होशंगाबाद से सामाजिक कार्यकर्ता पल्लव थुडगर की रपट….

होशंगाबाद। होशंगाबाद कलेक्टर ऑफिस से महज 100 कदम दूर घुमक्कड़ आदिवासी गाड़िया लोहार की 3 झुग्गियां हैं। इसमें कुल 13 लोग रहते हैं। ये समुदाय परंपरागत तौर से सड़क किनारे खेती में काम आने वाले लोहे के उपकरण बनाकर बेचने का काम करता आ रहा है। मध्य-प्रदेश सरकार की विमुक्त घुमक्कड़ जनजाति की लिस्ट में गाडिया लोहार भी शामिल हैं।

कोरोना के कारण लगे लॉक डाउन में सरकार के तमाम प्रबंधों में ये समुदाय छूटा हुआ दिखाई पड़ता है। समुदाय के शंकर मायूसी से बताते हैं कि मेरे अपने जीवन में कभी भी इतनी लाचारी नहीं देखी। हमारे हुनर से हम कमा खा लेते थे, लेकिन आज लाचार हैं।

शंकर बताते हैं कि वे होशंगाबाद जिले में गाँव में घूमकर खेती के उपकरण जैसे कुल्हाड़ी, हसियां, गैती इत्यादि बनाकर बेचा करते थे। ये काम अप्रैल से मई तक करते थे। इसी काम में वे साल भर का अनाज और कुछ पैसा जोड़ लेते थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते इस बार धंधा नहीं कर पाए। शंकर चिंता करते हुए बोलते हैं कि कोरोना से हम मरें या न मरें लेकिन पूरा साल कैसे निकलेगा, इस बात की चिंता हमें मार दे रही है, क्योंकि लॉक डाउन खुलने के बाद काम का सीजन ही नहीं बचेगा।

विमुक्त घुमक्कड़, अर्ध घुमक्कड़ जन-जाति आयोग नहीं ले रहा सुध
यूँ तो मध्य-प्रदेश में विमुक्त घुमक्कड़ एवं अर्ध घुमक्कड़ समुदाय का आयोग है जो कि हर जिले में है। लेकिन अभी तक उसके जरिये भी कोई सुध विमुक्त घुमक्कड़ बस्तियों और डेरों की नहीं ली गई है। न ही इस समुदाय को कोई आर्थिक सहयता राशि मिली है।

सरकार के पास नहीं है पर्याप्त प्रबंध
शंकर की पत्नी बताती हैं कि 21 मार्च से चालू हुए लॉक डाउन में हम 4 लोगों के परिवार को 12 किलो गेहूं और 2 किलो चावल सिर्फ एक बार मिला। गेहूं पिसवाने का पैसा नहीं बचा तो 2 किलो गेंहू देकर 10 किलो गेहूं पिसवा कर लेकर आये। तेल, मसाले, माचिस सब कुछ महंगा बिक रहा है। 1 रुपए की माचिस 3 रुपए में मिलती है। गेहूं और चावल अगर खाएं भी तो कैसे खाएं। लाल मिर्च, नमक और पानी के साथ रोटी खाने को मजबूर हैं। अब तो मिर्च और नमक भी ख़तम हो गया है।

तोमर सिंह बताते हैं कि लॉक डाउन लगने के बाद 10 दिन तो सेठ लोग आकर खाने के पैकेट देकर गए। उसके बाद धीमे धीमे वो भी आना बंद हो गया। जो पके हुए खाने के पैकेट आ रहे थे, वे परिवार में पूरे नहीं पड़ते थे। अगर सरकार हमारे रोजगार की व्यवस्था कर दे तो हमें किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन हम रोड किनारे काम करने वाले लोग हैं। तो हमारे ऊपर दान दया करने तो लोग आते हैं, लेकिन जिम्मेदारी से लगातार नहीं आते। हमें रोजाना डर लगा रहता है कि आज कुछ खाने को नसीब होगा या नहीं?

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